
सुमेरपुर (पाली)। दीपावली की जगमगाहट से पहले राजस्थान के सबसे बड़े व्यापारिक केंद्रों में शुमार सुमेरपुर का मुख्य बाजार एक बार फिर बारूद के जिंदा बंकर में तब्दील हो चुका है। मारवाड़ और गोडवाड़ अंचल के दर्जनों गांवों की लाइफलाइन माने जाने वाले इस शहर में भैरू चौक से गांधी मूर्ति तक का संकरा गलियारा इस वक्त सीधे तौर पर किसी टाइम बम के मुहाने पर खड़ा है। सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) की सख्त नज़ीरें, पेट्रोलियम तथा विस्फोटक सुरक्षा संगठन (PESO) के कड़े दिशा-निर्देश और पाली-सिरोही पट्टी के वे पुराने खूनी अग्निकांड जिनमें मासूम मलबे में तब्दील हो गए थे—सब कुछ चंद रसूखदार थोक कारोबारियों के मुनाफे और प्रशासनिक सांठगांठ की भेंट चढ़ चुका है।
सदियों पुरानी परंपरा के तहत त्योहार पर व्यापारी दुकानों के बाहर सामान सजाते हैं, लेकिन इसी बेकाबू भीड़ के बीच जब आतिशबाजी की दुकानें सजती हैं, तो उत्सव का माहौल खौफ में बदल जाता है। भैरू चौक से गांधी मूर्ति तक एक-दूसरे से सटकर लगने वाली दुकानें और आसपास के संकरे मकानों में बने अवैध गोदाम खुलेआम सुरक्षा मानकों को धता बता रहे हैं। कानूनन जो व्यवस्था खुले मैदान में होनी चाहिए थी, उसे शहर के सबसे संकरे गले में ठूंस दिया गया है।
मुख्य बाजार की मौजूदा स्थिति सीधे तौर पर दो बड़े गंभीर खतरों को जन्म दे रही है:
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अवैध गोदाम और नियमों की खुली अवहेलना: एक्सप्लोसिव रूल्स 2008 और सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार घनी आबादी में पटाखों का थोक भंडारण गैर-जमानती अपराध है, जिसके लिए चारों तरफ सुरक्षित दूरी और अग्निरोधी पक्के निर्माण अनिवार्य हैं। इसके विपरीत, मुख्य बाजार के संकरे कमरों और तहखानों में टनों बारूद का अवैध स्टॉक छिपाकर रखा गया है, जहां न दुकानों के बीच 3 मीटर की अनिवार्य दूरी है और न ही वेंटिलेशन।
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आपातकालीन निकास शून्य, दमकल को लगेंगे दो घंटे: त्योहारी सीजन में इस संकरे मार्ग पर बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों का भारी हुजूम होता है। यदि पाली या सिरोही जैसे पुराने हादसों की तरह यहां जरा सी भी चिंगारी भड़की, तो भगदड़ के बीच दमकल की गाड़ियों को बाजार में घुसने तक में दो घंटे का वक्त लग जाएगा, जिससे संभलने या जान बचाने का कोई मौका नहीं मिलेगा।
हैरानी की बात यह है कि हर साल दीपावली से पहले उपखंड स्तर पर बैठकों का पाखंड रचा जाता है और कागजों में फरमान छूटता है कि सुरक्षा की खातिर सभी दुकानें खुले ‘दशहरा मैदान’ में ही लगाई जाएंगी। लेकिन जैसे ही त्योहार नजदीक आता है और होलसेल व्यापारियों की लॉबी सक्रिय होती है, प्रशासन के कदम थरथराने लगते हैं। जनता अब खुलेआम यह चुभता सवाल पूछ रही है कि आखिर प्रशासन और इन रसूखदारों को दशहरा मैदान में ऐसा कौन सा रावण दिखता है जिससे वे वहां जाने से कतराते हैं? क्या किसी बड़े अग्निकांड के बाद ही प्रशासन की कुंभकर्णी नींद टूटेगी, या फिर जिला प्रशासन इस बारूद के अवैध खेल पर नकेल कसकर इन दुकानों को तत्काल सुरक्षित मैदान में धकेलने की हिम्मत दिखाएगा?
बारूद के गोदामों पर क्या कहते हैं PESO और एक्सप्लोसिव रूल्स 2008?
पेट्रोलियम तथा विस्फोटक सुरक्षा संगठन (PESO) और केंद्र सरकार के विस्फोटक नियम 2008 के तहत गोदाम और भंडारण के कड़े नियम हैं, जिनकी सुमेरपुर में धज्जियां उड़ रही हैं:
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रिहायशी व कमर्शियल कॉम्पलेक्स में भंडारण पर पूर्ण प्रतिबंध: रिहायशी इमारतों, दुकानों के ऊपर बने कमरों या भीड़भाड़ वाले व्यावसायिक बाजारों में 1 किलोग्राम भी बारूद या पटाखे का अतिरिक्त भंडारण गैर-जमानती अपराध है।
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सेफ्टी डिस्टेंस (सुरक्षा दूरी): अधिकृत मैगजीन/गोदाम चारों तरफ से कम से कम 15 से 45 मीटर (भंडारण क्षमता के अनुसार) खुले क्षेत्र से घिरा होना चाहिए। वहां कोई अन्य पक्की इमारत, ट्रांसफार्मर या बिजली की लाइन नहीं हो सकती।
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डबल डोर और फायर प्रूफिंग: गोदाम की दीवारें कम से कम 9 इंच पक्की ईंट/कंक्रीट की, छत आरसीसी और दरवाजे लोहे की दोहरी चादर से अग्निरोधी होने चाहिए।
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अग्निशमन व्यवस्था और वेंटिलेशन: गोदाम में ऑटोमैटिक स्प्रिंकलर, भारी क्षमता वाले CO2/DCP एक्सटिंग्विशर और स्पार्क-फ्री वेंटिलेशन अनिवार्य है।
सुमेरपुर के मुख्य बाजार में बने तथाकथित तहखाने और गोदाम इनमें से एक भी मानक पूरा नहीं करते। यह पूरी तरह ‘अवैध बारूद बंकर’ हैं।
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