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CJP के सौरव दास और आशुतोष रांका को 7 दिन बाद मिली जमानत, जंतर-मंतर प्रदर्शन मामले में SEM कोर्ट ने दिया रिहाई का आदेश
CJP के सौरव दास और आशुतोष रांका को 7 दिन बाद मिली जमानत, जंतर-मंतर प्रदर्शन मामले में SEM कोर्ट ने दिया रिहाई का आदेश

दिल्ली हाईकोर्ट ने सीधे हस्तक्षेप से किया इनकार, निचली अदालत के आदेश को रिवीजन पिटीशन के जरिए चुनौती देने की दी सलाह; दोनों नेताओं से जुड़े मामलों की जांच क्राइम ब्रांच को सौंपी गई।

नई दिल्ली, 21 अक्टूबर। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से जुड़े मामले में सात दिन बाद राहत मिली है। बुधवार को दिल्ली के विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) ने दोनों नेताओं की रिहाई का आदेश दिया। दोनों को 13 अक्टूबर को प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिया गया था और अगले दिन पांच दिन की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया गया था।

19 अक्टूबर को उनकी हिरासत दो दिन और बढ़ा दी गई थी। इसके बाद दोनों नेताओं ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हालांकि, हाईकोर्ट ने मामले में सीधे हस्तक्षेप करने के बजाय उपलब्ध कानूनी प्रक्रिया अपनाने की सलाह दी। इसी बीच SEM अदालत ने जमानती बॉन्ड की प्रक्रिया पर सुनवाई के बाद उनकी रिहाई का आदेश जारी कर दिया।

दिल्ली पुलिस ने आशुतोष-सौरव को 13 अक्टूबर को जंतर-मंतर से हिरासत में लिया था।  
 - Dainik Bhaskar

जंतर-मंतर पर तिरंगा लेकर पहुंचे थे CJP नेता

मामले की शुरुआत 13 अक्टूबर को हुई, जब कॉकरोच जनता पार्टी के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका अपने समर्थकों के साथ राष्ट्रीय ध्वज लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पहुंचे थे।

इससे एक दिन पहले, 12 अक्टूबर को जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाए जाने के बाद वहां विरोध प्रदर्शन को लेकर प्रतिबंध लागू हो गया था। इसके बावजूद CJP नेताओं और उनके समर्थकों ने वहां पहुंचकर विरोध दर्ज कराने का प्रयास किया।

दिल्ली पुलिस के अनुसार, प्रदर्शनकारियों ने प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश करने का प्रयास किया और बैरिकेडिंग से जुड़ी पाबंदियों का उल्लंघन किया। पुलिस ने इसे सार्वजनिक शांति और कानून-व्यवस्था के लिए संभावित खतरा मानते हुए कार्रवाई की।

दोनों नेताओं को हिरासत में लेने के बाद विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, जहां शांति बनाए रखने के लिए पहले दिए गए बॉन्ड के कथित उल्लंघन और दोबारा शांति भंग होने की आशंका के आधार पर उन्हें पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।

पांच दिन की हिरासत के बाद दो दिन और बढ़ाई गई अवधि

शुरुआती हिरासत अवधि समाप्त होने पर 19 अक्टूबर को दोनों नेताओं को दोबारा SEM के समक्ष पेश किया गया।

दिल्ली पुलिस ने आशंका जताई कि रिहाई मिलने पर दोनों नेता फिर से प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रदर्शन कर सकते हैं, जिससे कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

दूसरी ओर, बचाव पक्ष ने हिरासत जारी रखने के आधारों पर सवाल उठाए। वकीलों का तर्क था कि केवल आशंका के आधार पर किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित नहीं की जानी चाहिए।

सुनवाई के बाद मजिस्ट्रेट ने दोनों की हिरासत दो दिन और बढ़ा दी। इस आदेश के खिलाफ कानूनी चुनौती देने के लिए दोनों नेताओं की ओर से दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई।

दिल्ली हाईकोर्ट ने सीधे सुनवाई करने पर उठाए सवाल

बुधवार को दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की अदालत में दोनों नेताओं की याचिकाओं पर सुनवाई हुई।

सुनवाई के दौरान अदालत ने सवाल किया कि जब निचली अदालत के आदेश को चुनौती देने के लिए कानून में अलग व्यवस्था मौजूद है, तो याचिकाकर्ताओं ने सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का रुख क्यों किया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी न्यायिक आदेश को चुनौती देने के लिए उपलब्ध वैधानिक उपायों का सामान्यतः पहले इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को संबंधित आदेश के खिलाफ रिवीजन पिटीशन दाखिल करने का विकल्प अपनाने की सलाह दी। इसके बाद दोनों नेताओं की ओर से मौजूदा याचिकाएं वापस ले ली गईं।

रिवीजन पिटीशन दाखिल करने की सलाह क्यों दी गई?

सुनवाई का महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि हाईकोर्ट ने सीधे संवैधानिक याचिका दाखिल करने के औचित्य पर प्रश्न उठाया।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को मौलिक अधिकारों के संरक्षण और अन्य कानूनी उद्देश्यों के लिए आदेश तथा रिट जारी करने की शक्ति देता है।

वहीं, रिवीजन पिटीशन के माध्यम से सक्षम उच्चतर अदालत के सामने अधीनस्थ अदालत के आदेश की वैधानिकता, प्रक्रिया और न्यायिक औचित्य की समीक्षा का अनुरोध किया जा सकता है।

इस मामले में चुनौती मजिस्ट्रेट के हिरासत संबंधी आदेश को दी गई थी। इसलिए हाईकोर्ट ने उपलब्ध वैधानिक उपचार का सहारा लेने पर जोर दिया।

हालांकि, अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट की संवैधानिक शक्तियां समाप्त नहीं होतीं। विशेष परिस्थितियों में वैकल्पिक कानूनी उपाय मौजूद होने के बावजूद भी हाईकोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की चार महत्वपूर्ण टिप्पणियां

1. पहले शांति बनाए रखने का बॉन्ड दिया, फिर विवाद क्यों?

हाईकोर्ट ने इस बात पर सवाल उठाया कि दोनों नेताओं ने पहले शांति बनाए रखने का बॉन्ड दिया था। इसके बावजूद वे दोबारा ऐसी गतिविधि में शामिल होने के आरोपों का सामना कर रहे हैं, जिससे सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका जताई गई।

अदालत ने पूछा कि यदि बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन हुआ है, तो संबंधित अधिकारियों की कार्रवाई को किस आधार पर गलत बताया जा रहा है।

2. बैरिकेडिंग पार करने से बिगड़ सकती थी कानून-व्यवस्था

अदालत ने प्रदर्शन स्थल पर लगाए गए बैरिकेड और सुरक्षा प्रतिबंधों का भी उल्लेख किया।

सुनवाई के दौरान यह प्रश्न सामने आया कि यदि प्रतिबंधित क्षेत्र में कुछ प्रदर्शनकारी प्रवेश करते हैं, तो उनके साथ अन्य लोगों के जुड़ने से कानून-व्यवस्था की चुनौती पैदा हो सकती है।

अदालत ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और आवश्यक अनुमति के महत्व पर भी जोर दिया।

3. उम्र पूछने के बाद ‘जेन-जी’ पर टिप्पणी

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने दोनों याचिकाकर्ताओं की उम्र के बारे में जानकारी मांगी।

बचाव पक्ष की ओर से बताया गया कि दोनों नेताओं की उम्र लगभग 27 और 31 वर्ष है।

इस पर अदालत ने उनके ‘जेन-जी’ होने के संदर्भ में टिप्पणी की। साथ ही यह भी पूछा कि दोनों नेता कौन हैं, क्या काम करते हैं और जिस संगठन से जुड़े हैं, उसके उद्देश्य क्या हैं।

4. प्रतिबंध होने के बावजूद जंतर-मंतर जाने का फैसला क्यों?

हाईकोर्ट ने यह भी सवाल किया कि जब जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को लेकर प्रतिबंध लागू था, तो दोनों नेता वहां क्यों पहुंचे।

अदालत ने इस तथ्य का उल्लेख किया कि जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने से जुड़ा विवाद सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।

ऐसी स्थिति में प्रदर्शनकारियों द्वारा प्रतिबंधित स्थल पर पहुंचने के फैसले को लेकर अदालत ने सवाल उठाए।

हाईकोर्ट में दोनों पक्षों ने रखीं दलीलें

सौरव दास और आशुतोष रांका की ओर से अधिवक्ता अभिक चिमनी ने अदालत में पक्ष रखा।

वहीं, दिल्ली पुलिस की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा और केंद्र सरकार के स्थायी अधिवक्ता आशीष दीक्षित पेश हुए।

बचाव पक्ष ने हिरासत की वैधानिकता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े सवाल उठाए, जबकि पुलिस की ओर से सार्वजनिक शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद याचिकाकर्ताओं को वैकल्पिक कानूनी उपाय अपनाने की सलाह दी।

SEM कोर्ट से रिहाई का आदेश, सात दिन की हिरासत समाप्त

हाईकोर्ट में हुई सुनवाई के बाद बुधवार को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष भी मामले की सुनवाई हुई।

दिल्ली पुलिस ने हिरासत बढ़ाने का अनुरोध किया था, जबकि बचाव पक्ष ने दोनों नेताओं की रिहाई की मांग की।

सुनवाई के बाद SEM ने सौरव दास और आशुतोष रांका की रिहाई का आदेश दिया। इस दौरान जमानती बॉन्ड की प्रक्रिया भी अदालत के सामने रखी गई।

इस आदेश के साथ सात दिनों से हिरासत में चल रहे दोनों नेताओं को राहत मिली। हालांकि, रिहाई का आदेश मिलने का अर्थ यह नहीं है कि उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले समाप्त हो गए हैं।

दोनों नेताओं से जुड़े मामलों की जांच अब क्राइम ब्रांच करेगी

जंतर-मंतर प्रदर्शन विवाद के बीच दिल्ली पुलिस ने सौरव दास और आशुतोष रांका से जुड़े मामलों की जांच क्राइम ब्रांच को सौंपने का फैसला किया है।

इससे पहले कनॉट प्लेस थाने में दर्ज मामले को क्राइम ब्रांच के हवाले किया गया था। इसके बाद जंतर-मंतर से संबंधित मामले की जांच भी क्राइम ब्रांच को स्थानांतरित कर दी गई।

अब जांच एजेंसी दोनों मामलों में उपलब्ध साक्ष्यों, घटनाक्रम और संबंधित आरोपों की जांच करेगी।

पुलिस की जांच में यह भी देखा जाएगा कि प्रदर्शन के दौरान किन परिस्थितियों में प्रतिबंधों का कथित उल्लंघन हुआ और क्या संबंधित गतिविधियों में किसी दंडनीय अपराध के तत्व मौजूद हैं।

AISA अध्यक्ष नेहा बोरा की याचिका पर 22 अक्टूबर को सुनवाई

इसी घटनाक्रम से जुड़े एक अन्य मामले में दिल्ली हाईकोर्ट में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा की याचिका भी विचाराधीन है।

नेहा बोरा ने दिल्ली पुलिस के उस नोटिस को चुनौती दी है, जिसमें उन्हें शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने को कहा गया है।

याचिका में नोटिस निरस्त करने के साथ ही पुलिस को उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई करने से रोकने का निर्देश देने की मांग की गई है।

उनके अधिवक्ता के अनुरोध पर न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने सुनवाई स्थगित कर दी। अब इस मामले की अगली सुनवाई 22 अक्टूबर को निर्धारित है।

NEET पेपर लीक को लेकर 36 दिन तक चला था CJP का प्रदर्शन

कॉकरोच जनता पार्टी इससे पहले भी विभिन्न मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शनों में सक्रिय रही है।

पार्टी ने 20 जून से 25 जुलाई तक NEET पेपर लीक विवाद को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हुए आंदोलन चलाया था।

इस दौरान लगातार 36 दिनों तक प्रदर्शन किया गया। आंदोलन में विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने हिस्सा लिया। उपलब्ध विवरण के अनुसार, सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी भूख हड़ताल पर बैठे थे।

20 जुलाई को संगठन ने संसद की ओर मार्च करने का प्रयास भी किया था।

25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद संगठन ने अपना प्रदर्शन समाप्त करने की घोषणा की थी।

इस आंदोलन के बाद CJP राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आई थी। अब जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन और उसके बाद पुलिस कार्रवाई को लेकर संगठन फिर सुर्खियों में है।

प्रदर्शन के अधिकार और कानून-व्यवस्था को लेकर उठे सवाल

सौरव दास और आशुतोष रांका की हिरासत तथा रिहाई के मामले ने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए लागू प्रतिबंधों के बीच कानूनी संतुलन की बहस को फिर सामने ला दिया है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा की स्वतंत्रता प्रदान करता है। हालांकि, इन अधिकारों पर संविधान के अनुरूप युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

इस मामले में दिल्ली पुलिस ने प्रतिबंधित स्थल पर प्रदर्शन और शांति भंग होने की आशंका को कार्रवाई का आधार बताया है। वहीं, बचाव पक्ष ने हिरासत की आवश्यकता और उसकी कानूनी प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।

फिलहाल SEM अदालत के आदेश से दोनों नेताओं की हिरासत समाप्त करने का रास्ता साफ हुआ है, लेकिन उनसे जुड़े आपराधिक मामलों की जांच और संबंधित कानूनी कार्यवाही आगे भी जारी रह सकती है।

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