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संयम लोढ़ा ही निशाने पर क्यों? गैंग के खौफ को चुनौती, स्थानीय नेटवर्क या पुरानी रंजिश; हत्या की कथित साजिश के पीछे 3 बड़े सवाल
संयम लोढ़ा ही निशाने पर क्यों? गैंग के खौफ को चुनौती, स्थानीय नेटवर्क या पुरानी रंजिश; हत्या की कथित साजिश के पीछे 3 बड़े सवाल

दो शूटरों की गिरफ्तारी और हथियार बरामदगी के बाद भी पूर्व विधायक को मिली धमकी। आखिर किसके इशारे पर हुई रेकी, किसने उपलब्ध कराई स्थानीय मदद और धमकी के पीछे असली मकसद क्या है?

जवाई टुडे विशेष रिपोर्ट | सिरोही-सुमेरपुर, 22 अक्टूबर।

पूर्व विधायक संयम लोढ़ा को जान से मारने की धमकी का मामला केवल एक फोन कॉल तक सीमित नहीं है। सितंबर में उनके फार्म हाउस की कथित रेकी, संदिग्ध शूटरों की गिरफ्तारी और हथियारों की बरामदगी के बाद अक्टूबर में फिर धमकी मिलना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।

सबसे बड़ा सवाल है—आखिर संयम लोढ़ा को ही क्यों निशाना बनाया गया?

क्या इसकी वजह संगठित अपराध के खिलाफ उनकी बयानबाजी है? क्या सिरोही-पाली क्षेत्र में किसी स्थानीय आपराधिक नेटवर्क से टकराव हुआ? या फिर किसी पुरानी रंजिश में गैंग का इस्तेमाल करने की कोशिश हुई? इन तीनों संभावनाओं पर चर्चा हो रही है। हालांकि, पुलिस ने अब तक किसी एक मकसद को अंतिम रूप से प्रमाणित नहीं किया है।

पहला सवाल: क्या गैंग के खौफ और वसूली के कथित तरीके पर चोट बनी वजह?

संयम लोढ़ा ने पहले सार्वजनिक तौर पर यह आरोप लगाया था कि कुछ प्रभावशाली लोग पुलिस सुरक्षा हासिल करने के लिए आपराधिक गिरोहों से खुद को धमकी दिलवाते हैं। उनका यह बयान संगठित अपराध और सुरक्षा व्यवस्था के कथित दुरुपयोग पर सवाल उठाता है। ऐसे में एक संभावित सवाल यह है कि क्या इस तरह के बयानों से किसी गैंग के डर और प्रभाव को चुनौती महसूस हुई?

संगठित अपराध में धमकी का इस्तेमाल केवल हिंसा के लिए नहीं, बल्कि भय पैदा करने और अवैध वसूली जैसे उद्देश्यों के लिए भी किया जा सकता है। यदि कोई सार्वजनिक व्यक्ति ऐसे तरीकों पर सवाल उठाता है, तो उससे अपराधियों के प्रभाव को चुनौती मिल सकती है। लेकिन यह अभी एक संभावित व्याख्या है, प्रमाणित मकसद नहीं। ऐसा कोई पुष्ट साक्ष्य सार्वजनिक नहीं है जिससे साबित हो कि लोढ़ा को उनके इसी बयान के कारण धमकाया गया।

दूसरा सवाल: क्या सिरोही-पाली में किसी स्थानीय नेटवर्क से टकराव हुआ?

इस मामले में स्थानीय संपर्कों की भूमिका एक महत्वपूर्ण जांच का विषय है। प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, संदिग्ध शूटरों ने पूर्व विधायक के फार्म हाउस की रेकी की थी। उनके ठहरने, वाहन के इस्तेमाल और आवाजाही से जुड़े सुराग भी जांच में सामने आए। सवाल यह है कि बाहर से आए संदिग्धों को स्थानीय रास्तों और पूर्व विधायक की गतिविधियों की जानकारी कैसे मिली?

क्या उन्हें किसी ने वाहन, ठहरने की जगह या दूसरी सहायता उपलब्ध कराई? यदि ऐसा हुआ तो सहायता देने वाले व्यक्ति की क्या भूमिका थी? सिरोही और पाली के सीमावर्ती इलाकों में तस्करी तथा अन्य आपराधिक गतिविधियों को लेकर पहले भी खबरें सामने आती रही हैं। लेकिन इस मामले को किसी विशेष तस्करी नेटवर्क से जोड़ने वाला प्रत्यक्ष प्रमाण अभी सार्वजनिक नहीं है। इसलिए यह दावा करना कि किसी तस्करी गिरोह ने लोढ़ा को निशाना बनाया, फिलहाल उचित नहीं होगा।

तीसरा सवाल: क्या गैंग के नाम के पीछे किसी पुरानी रंजिश की भूमिका है?

जांच का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कहीं किसी अन्य व्यक्ति की दुश्मनी को अंजाम देने के लिए आपराधिक गिरोह का नाम या सहयोग तो इस्तेमाल नहीं किया गया। सितंबर में गिरफ्तार संदिग्धों की पूछताछ से जुड़े प्रकाशित विवरणों में पारिवारिक या वैचारिक मतभेद का दावा भी सामने आया था। पुलिस की ओर से इस दावे की पुष्टि अंतिम मकसद के रूप में नहीं की गई।

यही वजह है कि किसी राजनीतिक, कारोबारी या निजी रंजिश की संभावना की पड़ताल महत्वपूर्ण हो सकती है। लेकिन किसी स्थानीय नेता, कारोबारी या परिवार के सदस्य पर साजिश अथवा सुपारी देने का आरोप लगाने के लिए ठोस साक्ष्य जरूरी हैं। अभी उपलब्ध जानकारी किसी व्यक्ति को इस आधार पर दोषी ठहराने की अनुमति नहीं देती।

सबसे बड़ा रहस्य: शूटर पकड़े गए, फिर धमकी क्यों आई?

इस मामले में घटनाओं का क्रम भी ध्यान देने योग्य है। सितंबर में कथित हत्या की साजिश के सिलसिले में दो शूटर गिरफ्तार किए गए। पुलिस को उनकी गतिविधियों से जुड़े डिजिटल और अन्य सुराग मिले। इसके बावजूद 11 अक्टूबर को संयम लोढ़ा को विदेशी नंबरों से तीन कॉल आने और धमकी भरा ऑडियो भेजे जाने की जानकारी सामने आई।

यहां दो संभावनाएं महत्वपूर्ण हैं। पहली, क्या सितंबर में सामने आए नेटवर्क के अन्य सदस्य अब भी सक्रिय थे? दूसरी, क्या अक्टूबर में धमकी देने वाला व्यक्ति किसी अलग उद्देश्य से पहले सामने आए गिरोह का नाम इस्तेमाल कर रहा था? दोनों सवालों का जवाब कॉल की तकनीकी जांच, गिरफ्तार आरोपियों से मिले साक्ष्यों और उनके संपर्कों के मिलान से ही मिल सकता है।

रेकी करने वालों के स्थानीय संपर्कों तक पहुंचना क्यों जरूरी?

किसी व्यक्ति की गतिविधियों की निगरानी करने के आरोप में गिरफ्तार संदिग्धों से जुड़ी जांच में केवल उनकी पहचान पता लगाना पर्याप्त नहीं होता। जांच एजेंसियों के लिए यह स्थापित करना भी महत्वपूर्ण होता है कि उन्हें संबंधित इलाके तक पहुंचने, वहां ठहरने और जानकारी जुटाने में किसकी मदद मिली।

संयम लोढ़ा मामले में होटल के सीसीटीवी, वाहन खरीद और अन्य गतिविधियों से जुड़े सुरागों की जानकारी सामने आ चुकी है।इनसे संदिग्धों की गतिविधियों का क्रम समझने और उनके संपर्कों की पहचान करने में मदद मिल सकती है। यदि स्थानीय सहायता के प्रमाण मिलते हैं, तो जांच एजेंसियां यह पता लगा सकती हैं कि सहायता देने वाला व्यक्ति कथित साजिश से अवगत था या नहीं।

धमकी देने वाले ने आरजू बिश्नोई का नाम क्यों लिया?

अक्टूबर में मिले ऑडियो संदेश में धमकी देने वाले ने खुद को आरजू बिश्नोई के नाम से परिचित कराया था। लेकिन किसी गैंगस्टर का नाम लेना और वास्तव में उससे जुड़ा होना अलग-अलग बातें हैं। जांच में यह स्पष्ट करना जरूरी है कि संदेश भेजने वाला कौन था, उसका वास्तविक संपर्क किस नेटवर्क से था और क्या उसने किसी दूसरे व्यक्ति के नाम का इस्तेमाल किया। विदेशी नंबर से कॉल दिखाई देना भी उसके वास्तविक स्थान का अंतिम प्रमाण नहीं है।

क्या इस मामले में कोई नया खुलासा हुआ है?

22 अक्टूबर तक उपलब्ध प्रकाशित जानकारी के आधार पर धमकी के पीछे तीनों संभावित मकसदों में से किसी एक की आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। फिलहाल सबसे ठोस तथ्य संदिग्धों की गिरफ्तारी, रेकी से जुड़े जांच सुराग, हथियारों की बरामदगी, धमकी की शिकायत और सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाए जाने से संबंधित हैं।

जवाई टुडे का सवाल यही है—यदि सितंबर में कथित साजिश का खुलासा हो चुका था, तो अक्टूबर में धमकी देने वाले तक जांच एजेंसियां कब और कैसे पहुंचेंगी?

इस सवाल का जवाब मिलने पर ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि दोनों घटनाएं एक ही साजिश की कड़ियां हैं या इनके पीछे अलग-अलग मकसद हैं।

जवाई टुडे | विशेष अपराध विश्लेषण

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