
पुलिस बोली—’न हत्या के साक्ष्य, न चोट के निशान’; ग्राउंड रिपोर्ट में संतों-ग्रामीणों का खुलासा—’जीभ बाहर निकली थी, चेहरा पड़ा था काला, मौके से मिला था खून लगा डंडा’
शिवगंज/सिरोही (विशेष इनवेस्टिगेटिव रिपोर्ट)। शिवगंज क्षेत्र के बीहड़ों में स्थित प्राचीन कबेश्वर महादेव तीर्थ के संत त्रिवेणीगिरी जी महाराज की संदिग्ध मौत के मामले ने अब नया और बेहद गंभीर मोड़ ले लिया है। एक तरफ जहां स्थानीय पुलिस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इसे प्रथम दृष्टया हत्या मानने से इनकार कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ आश्रम पहुंचे प्रत्यक्षदर्शियों, स्थानीय संतों और ग्रामीणों के दावों ने खाकी की कार्यशैली और जांच के ढर्रे पर सीधे सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।
सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि अगर संत की हत्या नहीं हुई, तो आखिर उनकी मौत कैसे हुई? पुलिस अपनी पूरी प्रेस वार्ता में इस बुनियादी सवाल का कोई स्पष्ट और ठोस जवाब नहीं दे पाई। इस बीच, संत त्रिवेणीगिरी जी को आश्रम परिसर में ही वैदिक विधि-विधान से समाधि दे दी गई है। वहीं, मामले की निष्पक्ष जांच और उच्चस्तरीय तहकीकात की मांग को लेकर संत समाज और शहरवासी 10 अक्टूबर को बड़े धरने की तैयारी में हैं।
पुलिस का दावा: न चोट, न गला दबाने के निशान; कॉल डिटेल में भी सामान्य बातचीत
पुलिस अधिकारियों ने आज प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर दावा किया कि संत त्रिवेणीगिरी जी की हत्या नहीं हुई है और पोस्टमार्टम की प्रारंभिक रिपोर्ट में भी हत्या या हिंसा से जुड़ा कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य सामने नहीं आया है:
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चोट के निशान नहीं: पुलिस का कहना है कि महाराज के शरीर पर न तो संघर्ष या मारपीट के कोई निशान मिले हैं और न ही गला दबाने (स्ट्रैंगुलेशन) के संकेत हैं।
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अंतिम कॉल की पड़ताल: पुलिस के अनुसार, संत त्रिवेणीगिरी जी के मोबाइल पर जिस व्यक्ति की अंतिम कॉल आई थी, उसे तलब कर पूछताछ की गई। उसके पास उपलब्ध कॉल रिकॉर्डिंग और बाद में संत द्वारा किए गए जवाबी कॉल के विश्लेषण से बातचीत पूरी तरह सामान्य पाई गई, जिसमें किसी प्रकार के विवाद या धमकी का अंदेशा नहीं दिखा।
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जांच खुली रखने का दावा: पुलिस का कहना है कि पोस्टमार्टम में हत्या का कारण स्पष्ट न होने के बावजूद केस को बंद नहीं किया गया है और विस्तृत विसरा/एफएसएल जांच रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है।
ग्राउंड रिपोर्ट: जीभ बाहर, चेहरा काला और खून से सना डंडा; प्रत्यक्षदर्शियों के रोंगटे खड़े करने वाले खुलासे
पुलिस के इन दावों के विपरीत, जब ग्राउंड जीरो यानी कामेश्वर महादेव आश्रम की पड़ताल की गई, तो वहां मौजूद संतों और ग्रामीणों ने आंखों देखा जो मंजर बयां किया, वह कई अनसुलझे रहस्य खड़े करता है:
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विकृत चेहरा और निकली हुई जीभ: पार्थिव शरीर को सबसे पहले देखने वाले ग्रामीणों और साथी संतों का कहना है कि संत त्रिवेणीगिरी जी का मुख असामान्य रूप से काला पड़ चुका था, मानो किसी घातक जहर या रासायनिक पदार्थ (केमिकल) का असर हुआ हो। उनकी जीभ मुंह से बाहर निकली हुई थी, जो सामान्य या प्राकृतिक मौत के लक्षणों से बिल्कुल मेल नहीं खाती।
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खून से सना डंडा: आश्रम से जुड़े लोगों का दावा है कि घटनास्थल के पास से एक डंडा बरामद हुआ था, जिस पर संदिग्ध रूप से खून के धब्बे लगे हुए थे। इसे बाद में पुलिस ने जब्त तो किया, लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसके संदर्भ में कोई खुलासा नहीं किया गया।
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लापरवाही की इंतहा: न फॉरेंसिक टीम पहुंची, न फिंगरप्रिंट उठाए: प्रत्यक्षदर्शियों का आरोप है कि किसी संत की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत के इतने संवेदनशील मामले में भी पुलिस ने घटनास्थल को सील नहीं किया। मौके पर कोई फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) या फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट की टीम नहीं बुलाई गई। संत की चप्पलें और पानी की बोतल आज भी घटनास्थल पर जस की तस लावारिस पड़ी हैं। केवल सामान्य डॉक्टरों की टीम से पोस्टमार्टम करवाकर खानापूर्ति कर ली गई।
29 को अनहोनी, 1 को पुलिस को भनक; 72 घंटे का ‘टाइम गैप’ बना पहेली
घटनाक्रम का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि संत के साथ अनहोनी कथित तौर पर 29 तारीख को ही घटित हो गई थी, लेकिन पुलिस और प्रशासन को इसकी भनक 1 तारीख को लगी। बीहड़ों के सुनसान इलाके में स्थित इस प्राचीन मंदिर में करीब 72 घंटे तक संत की सुध न लिया जाना इलाके में पुलिस गश्त और स्थानीय अभिसूचना (इंटेलिजेंस) की विफलता को दर्शाता है।
ग्रामीणों का कहना है कि जब शुरुआत से ही लापरवाही बरती गई और क्राइम सीन से वैज्ञानिक साक्ष्य नहीं जुटाए गए, तो अब पुलिस द्वारा आनन-फानन में हत्या की आशंका को खारिज करना संदेहास्पद लगता है।
समाधि के बाद आक्रोश, 10 अक्टूबर को आर-पार के मूड में संत समाज
संत त्रिवेणीगिरी जी महाराज को आश्रम परिसर में संतों और श्रद्धालुओं की मौजूदगी में भू-समाधि दे दी गई है। हालांकि, पुलिस के रुख से संत समाज और स्थानीय हिंदू संगठनों में भारी रोष व्याप्त है।
आरोपियों की पहचान न होने और लीपापोती की आशंका के चलते 10 अक्टूबर को शिवगंज में संत समाज और प्रबुद्ध नागरिकों ने अनिश्चितकालीन धरने का ऐलान किया है। संतों की दो-टूक मांग है कि:
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पूरे प्रकरण की जांच किसी उच्चस्तरीय एजेंसी या एसआईटी (SIT) से करवाई जाए।
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विसरा रिपोर्ट की त्वरित जांच करवाकर मौत के वास्तविक कारणों का वैज्ञानिक खुलासा किया जाए।
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घटनास्थल पर लापरवाही बरतने वाले पुलिसकर्मियों की जवाबदेही तय की जाए।
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